Sunday, May 11, 2008

क्रांतिकारी की कथा

क्रांतिकारी’ उसने उपनाम रखा था। खूब पढ़ा-लिखा युवक। स्वस्थ,सुंदर। नौकरी भी अच्छी। विद्रोही। मार्क्स-लेनिन के उद्धरण देता, चे-ग्वेवारा का खास भक्त। कॉफी हाउस में काफी देर तक बैठता। खूब बातें करता। हमेशा क्रांतिकारिता के तनाव में रहता। सब उलट-पुलट देना है। सब बदल देना है। बाल बड़े, दाड़ी करीने से बढ़ाई हुई। विद्रोह की घोषणा करता। कुछ करने का मौका ढूंढ़ता। कहता- “मेरे पिता की पीढ़ी को जल्दी मरना चाहिए। मेरे पिता घोर दकियानूस, जातिवादी, प्रतिक्रियावादी हैं। ठेठ बुर्जुआ। जब वे मरेंगे तब मैं न मुंडन कराऊंगा, न उनका श्राद्ध करूंगा। मैं सब परंपराओं का नाश कर दूंगा। चे-ग्वेवारा जिंदाबाद।”
कोई साथी कहता, “पर तुम्हारे पिता तुम्हें बहुत प्यार करते हैं।”
क्रांतिकारी कहता, “प्यार? हॉं, हर बुर्जुआ क्रांतिकारिता को मारने के लिए प्यार करता है। यह प्यार षडयंत्र है। तुम लोग नहीं समझते। इस समय मेरा बाप किसी ब्राह्मण की तलाश में है जिससे बीस-पच्चीस हजार रुपये लेकर उसकी लड़की से मेरी शादी कर देगा। पर मैं नहीं होने दूंगा। मैं जाति में शादी करूंगा ही नहीं। मैं दूसरी जाति की, किसी नीच जाति की लड़की से शादी करूंगा। मेरा बाप सिर धुनता बैठा रहेगा।”
साथी ने कहा, “अगर तुम्हारा प्यार किसी लड़की से हो जाए और संयोग से वह ब्राह्मण हो तो तुम शादी करोगे न?”
उसने कहा, “हरगिज नहीं। मैं उसे छोड़ दूंगा। कोई क्रांतिकारी अपनी जाति की लड़की से न प्यार करता है, न शादी। मेरा प्यार है एक कायस्थ लड़की से। मैं उससे शादी करूंगा।”
एक दिन उसने कायस्थ लड़की से कोर्ट में शादी कर ली। उसे लेकर अपने शहर आया और दोस्त के घर पर ठहर गया। बड़े शहीदाना मूड में था। कह रहा था, “आई ब्रोक देअर नेक। मेरा बाप इस समय सिर धुन रहा होगा, मां रो रही होगी। मुहल्ले-पड़ोस के लोगों को इकट्ठा करके मेरा बाप कह रहा होगा ‘हमारे लिए लड़का मर चुका’। वह मुझे त्याग देगा। मुझे प्रापर्टी से वंचित कर देगा। आई डोंट केअर। मैं कोई भी बलिदान करने को तैयार हूं। वह घर मेरे लिए दुश्मन का घर हो गया। बट आई विल फाइट टू दी एंड-टू दी एंड।”
वह बरामदे में तना हुआ घूमता। फिर बैठ जाता, कहता, “बस संघर्ष आ ही रहा है।”
उसका एक दोस्त आया। बोला, “तुम्हारे फादर कह रहे थे कि तुम पत्नी को लेकर सीधे घर क्यों नहीं आए। वे तो काफी शांत थे। कह रहे थे, लड़के और बहू को घर ले आओ।”
वह उत्तेजित हो गया, “हूँ, बुर्जुआ हिपोक्रेसी। यह एक षडयंत्र है। वे मुझे घर बुलाकर फिर अपमान करके, हल्ला करके, निकालेंगे। उन्होंने मुझे त्याग दिया है तो मैं क्यों समझौता करूं। मैं दो कमरे किराए पर लेकर रहूंगा।”
दोस्त ने कहा, “पर तुम्हें त्यागा कहां है?”
उसने कहा, “मैं सब जानता हूं- आई विल फाइट।”
दोस्त ने कहा, “जब लड़ाई है ही नहीं तो फाइट क्या करोगे?”
क्रांतिकारी कल्पनाओं में था। हथियार पैने कर रहा था। बारूद सुखा रहा था। क्रांति का निर्णायक क्षण आने वाला है। मैं वीरता से लडूंगा। बलिदान हो जाऊंगा। तीसरे दिन उसका एक खास दोस्त आया। उसने कहा, “तुम्हारे माता-पिता टैक्सी लेकर तुम्हें लेने आ रहे हैं। इतवार को तुम्हारी शादी के उपलक्ष्य में भोज है। यह निमंत्रण-पत्र बांटा जा रहा है।”
क्रांतिकारी ने सर ठोंक लिया। पसीना बहने लगा। पीला हो गया। बोला, “हाय, सब खत्म हो गया। जिंदगी भर की संघर्ष-साधना खत्म हो गयी। नो स्ट्रगल। नो रेवोल्यूशन। मैं हार गया। वे मुझे लेने आ रहे है। मैं लड़ना चाहता था। मेरी क्रांतिकारिता! मेरी क्रांतिकारिता! देवी, तू मेरे बाप से मेरा तिरस्कार करवा। चे-ग्वेवारा! डियर चे!”
उसकी पत्नी चतुर थी। वह दो-तीन दिनों से क्रांतिकारिता देख रही थी और हँस रही थी। उसने कहा, “डियर एक बात कहूँ। तुम क्रांतिकारी नहीं हो।”
उसने पूछा, “नहीं हूँ। फिर क्या हूँ?”
पत्नी ने कहा, “तुम एक बुर्जुआ बौड़म हो। पर मैं तुम्हें प्यार करती हूँ।”

( व्यंगकार हरिशंकर परसाई की रचना)

Saturday, March 8, 2008

....तो आज औरतों का दिन है!!

धन्य हुईं हम
साल के ग्यारह महीने,
उनतीस दिन
मर्दों के
और एक दिन औरतों के नाम!

उफ्
मजाक की भी एक हद होती है,
इतना फूहड़ मजाक,
हमारी बिरादरी की अस्मिता के साथ,
हमारे अस्तित्व की
वास्तविकता के साथ,
हमारे होने-न-होने के साथ,
मर्दवादियों की
ये जुर्रत तो देखिए।
धन्य हुईं हम

हां, ये सब
उन्हीं का किया-धरा है,
उन्हीं का लीपा-पोता है,
अपनी-अपनी दहलीज के इन हिटलरों से
कोई पूछे तो सही,
कि आखिर माजरा क्या है,
महिला दिवस...उफ्।
धन्य हुईं हम

कभी कहते हैं आधी दुनिया
कभी कहते हैं अर्धांगिनी
कभी कहते हैं कुछ
कभी कहते हैं कुछ
जो जी में आए
करें, कहें।
फिलहाल इतना ही!
धन्य हुईं हम


(आज तो दुनिया भर के लोग महिला दिवस मना रहे हैं, तो औरतनामा में लिखने के लिए साल के 11 महीने 29 दिन अपने पास बच जाते हैं, उन्हीं दिनों में अपनी बात लिखें...क्यों पर्याप्त होगा)

Wednesday, February 27, 2008

सीमोन के सवालों में स्त्री: दो


यह सही है कि औरत पुरुष की भांति एक मानव जाति है, किंतु यह कथन अमूर्त है. सत्य तो यह है कि प्रत्येक ठोस मानव हमेशा एकल औऱ अभिन्न व्यक्ति होता है. कुछ साल पहले की बात है, एक लेखिका ने अपनी तस्वीर अन्य लेखिकाओं के साथ खिंचवाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह अपनी गणना पुरुषों में करवाना चाहती हैं, लेकिन इस विशिष्टता को हासिल करने के लिए उन्हें अपने पति का सहारा लेना पड़ा. यदि प्रजनन की प्रक्रिया से औरत को परिभाषित नहीं किया जा सकता औ यदि हम शाश्वत नारी की अवधारणा के माध्यम से उसको व्याख्यायित नहीं करना चाहते, तब हमें इस प्रश्न का सामना तो करना ही पड़ेगा कि औरत क्या है? इस प्रश्न का एक प्रारम्भिक उत्तर तो हमारे सामने ही है. अपने आप में यह प्रश्न एक महत्वपूर्ण तथ्य है. एक पुरुष अपने आप को अपने से कम के संदर्भ में परिभाषित नहीं करता. वह अपने आपको शुरु से ही संपूर्ण व्यक्ति मान कर चलता है. जब हम मानव या व्यक्ति शब्द का उच्चारण करते हैं तो उसमें पुरुष और स्त्री, दोनों समाहित होते हैं. आदमी होना स्वयं एक विधेयक प्रक्रिया है. यह पारस्परिकता लिए हुए है, जबकि औरत होना केवल एक निषेध का प्रतिनिधित्व करता है. बिना किसी पारस्परिकता के यह एक सीमित संवर्ग द्वारा परिभाषित होता है.
साभी विचार-विमर्श के बीच यह सुनकर तो और भी ऊब होती है कि तुम ऐसा इसलिए सोचती हो, क्योंकि तुम एक औरत हो. लेकिन जो सच है, एक औरत वही सोच सकती है. पुरुष होना कोई विलक्षणता नहीं. पुरुष संपूर्ण मानवीय प्रकार है और उसी के संदर्भ में कुछ अन्य विलक्षणताओं को लिए हुए एक औरत अपने गर्भाशय के साथ है. एक औरत को उसकी विलक्षणताएं उसकी स्थिति में कैद कर देती हैं और उसकी अपनी प्रकृति की सीमा को अतिवादी ढंग से सीमाबद्ध कर देती हैं. हमेशा यह कहा जाता है कि स्त्री अपनी ग्रंथियों के सहयोग से सोचती है. पुरुष इस बात को बिल्कुल भूल जाता है कि उसकी शरीर-रचना में भी ग्रंथियां हैं. वह अपने शरीर को जगत् से सीधे संबंधित करता है और यह विश्वास करता है कि वह जगत को वस्तुपरक रूप से समझता है, जबकि वह औरत के शरीर को अजीबोगरीब सीमाबद्धताओं के कारण बोझिल पाता है.
अरस्तू ने औरत की परिभाषा यह कहकर दी कि औरत कुछ गुणवत्ताओं की कमियों के कारण ही औरत बनी है. हमें स्त्री के स्वभाव से यह समझना चाहिए कि प्राकृतिक रूप में उसमें कुछ कमियां हैं. वह एक प्रासंगिक जीव है. वह आदम की एक हड्डी से निर्मित है. इसलिए मानवता का स्वरूप पुरुष है और पुरुष औरत को औरत के लिए परिभाषित नहीं करता, बल्कि पुरुष से संबंधित ही परिभाषित करता है. वह औरत को स्वायत्त व्यक्ति नहीं मानता. कहा तो यहां तक भी जाता है कि औरत अपने बारे में नहीं सोच सकती और वैसी ही बन सकती है, जैसा बनने के लिए पुरुष उसे आदेश देगा. इसका अर्थ यह है कि वह असल में पुरुष के लिए भोग की वस्तु है और इसके अलावा कुछ भी नहीं. वह पुरुष के संदर्भ में ही परिभाषित और विभेदित की जाती है. वह आनुषंगिक है, अनिवार्य के बदले नैमित्त है, गौण है. पुरुष आत्म है, विषयी है. वह पूर्ण है, जबकि औरत बस अन्या है.
मौलिक रूप से सभी समूह स्वतंत्र थे. यह तो इतिहास की एक घटना है कि शक्तिशाली समूह ने कमजोर समूह को अधीनस्थ कर लिया. ऐसे समूह का अपना एक सामान्य अतीत, एक परंपरा और कभी-कभी संस्कृति तथा धर्म रहा है. अत: औरत और सर्वहारा के बीच दो समानांतर रेखाएं खींची जा सकती हैं. यह विभाजन सही हो सकता था, लेकिन औरत ने, सर्वहारा ने मानवता से अलग अपनी सामूहिक इकाई समझी और कभी अपने आपको अल्पसंख्यक के रूप में स्वयं बनाया. महत्वपूर्ण बात यह है कि सर्वहारा हमेशा से नहीं था, जबकि औरत हमेशा से रही है. औरत अपनी शरीर-संरचना और स्थितियों के कारण औरत है. इतिहास में हमेशा से औरत पुरुष के अधीनस्थ रही है. यदि औरत की स्थिति प्राकृतिक मान ली जाये, तो यह बदलाव की संभावना से परे हो जाती है. औरत अपने आपको एक ऐसी अनावश्यक वस्तु मानती है, जो कभी अनिवार्य नहीं हो सकती. इसीलिए औरत स्वयं इस परिवर्तन को लाने में असमर्थ रही है. सर्वहारा अपने वर्ग को हमलोग कहकर संबोधित करता है. अपने आप को इस प्रकार हम के रूप में संबोधित करते ही ये लोग विषयिता हो जाते हैं. लेकिन औरत अपने आपको हमलोग कहकर संबोधत नहीं करती. हां, यह अलग बात है कि कुछ नारीवादी स्त्रियां मंचीय प्रदर्शन के लिए अपने आपको स्त्री वर्ग से जोड़ती हैं. औरत कभी प्रामाणिक रूप से अपने प्रति वैयक्तिक दृष्टिकोण नहीं स्वीकारती. सर्वहारा ने रूस में क्रांति हासिल की. अफ्रीका की काली जाती आज भी अपनी स्वतंत्रता के लिए युद्ध कर रही है, किंतु औरत का विद्रोह आज भी महज एक प्रतीकात्मक आंदोलन और उपद्रव बनकर ही रह गया है. इन तमाम हलचलों और आलोचनाओं से कुछ हासिल नहीं हुआ. स्त्रीयों को तो वही मिला जो पुरुष ने अपनी इच्छा से उसे दे दिया. इस स्थिति में पुरुष दाता और औरत ग्रहिता के रूप में सामने आयी है. इसका प्रमुख कारण औरतों के पास अपने आपको एक इकाई के रूप में संगठित करने के ठोस साधनों का अभाव है. उनका न कोई अतीत है और न इतिहास, न अपना कोई धर्म है और न ही सर्वहारा की तरह ठोस क्रिया-कलापों का एक संगठित जगत्. स्त्रीयों के बीच सामूहिकता की भावना का अभाव है. ऐसी कोई जगह नहीं जहां वह झुंड बनाकर रहती हों यानी एक बड़े दल में अवस्थित हों. समूह के बदले औरत अकेली और पुरुषों के बीत बिखरी हुई है. वह पुरुष के घर में उसकी गृहस्थी में काम करती है. वह पुरुष की दी हुई आर्थिक सुविधाओं को भोगती हुई उसी के सामाजिक स्तर से अपना तादात्म्य स्थापित करती है. पुरुष उसके आसपास कभी पिता, कभी भाई, कभी पति तो कभी पुत्र के रूप में रहता है. बुर्जुवा वर्ग की औरत की समस्वरता अपने ही वर्ग के पुरुषों के साथ है. वह सर्वहारा स्त्रीयों के साथ एक प्राण नहीं हो सकती. औरत पुरुष और उसके पुरुषत्व को खत्म करने की कल्पना भी नहीं कर सकती.
यदि कानून औरत को बराबरी का आधार दे भी दे तो सामाजिक, नैतिकता और लोकव्यवहार उसके आड़े जाते हैं. दूसरी बातों के समान रहने पर भी आर्थिक क्षेत्र में औरत और मर्द बिल्कुल अलग अलग जाति के रूप में प्रस्तुत होते हैं. पुरुष को अच्छी नौकरी, बेहतर तनख्वाह और सफलता की ज्यादा सुविधाएं मिलती हैं, उद्योग, व्यवस्था और राजनीति में पुरुषों को ज्यादा ओहदे मिलते हैं और महत्वपूर्ण पदों पर उनका एकाधिकार भी रहता है. इन सबके अलावा हम देखते हैं पुरुष को शिक्षा के क्षेत्र में भी एक पारंपरिक सम्मान मिला हुआ है.
इसमें कोई संदेह नहीं की जो विजेता है, वह पूर्णता की स्थिति पायेगा, लेकिन ऐसा क्या था जिसके कारण पुरुष ही प्रारंभ से विजेता बना? यह भी तो संभव था कि औरत की जीत होती या फिर इस संघर्ष का इस प्रकार निदान नहीं होता. औरत को लेकर उठाया गया कोई भी प्रश्न नया नहीं है और बहुतों के उत्तर युगों से दिये जा रहे हैं, लेकिन औरत अन्या है, इसलिए पुरुष द्वारा दिये गये तमाम उत्तरों और तर्कों पर संदेह होना स्वाभाविक है. ये सारे उत्तर पुरुष अपने स्वार्थों के लिए देता है. बहुत पहले ही एक नारीवादी ने कहा था, "अब तक औरत के बारे में पुरुष ने जो कुछ भी लिखा है, उस पूरे पर शक किया जाना चाहिए, क्योंकि लिखनेवाला न्यायाधीश और अपराधी दोनों ही है."
सीमोन के सवाल............................................(जवाब चाहिए)
1. एक बार फिर यह प्रश्न उठता है कि स्त्री-पुरुष के मध्य का यह भेदभाव आखिर कैसे शुरु हुआ?
2. आखिर क्यों यह दुनिया अब तक पुरुष की ही रही है? क्या यह बदलाव अच्छा है? औरत के हित में है? इसके कारण औरत और मर्द में जागतिकविषयों में बराबरी का साझा होना संभव हो सकेगा?
3. क्या औरत अपनी शारीरिक-संरचना और स्थितियों की वजह से औरत है या वहज कुछ और है?
4. क्या औरत की स्थिति प्राकृतिक है और यहां बदलाव की कोई संभावना नहीं है?
5. यदि कानून औरत को बराबरी का आधार दे भी दे, तो क्यों सामाजिकता, नैतिकता और लोकव्यवहार उसके आड़े आ जाते हैं?

Monday, February 25, 2008

सीमोन के सवालों में स्त्रीःएक


....नारीत्व के ऊपर अब तक बहुत कालिख पोती जा चुकी है और शायद हमारे पास बहुत कुछ कहने को बचा भी नहीं है। सोचना यह है कि अब तक जो कुछ कहा गया, क्या वह वास्तव में समस्या की सही समझ के लिए पर्याप्त है? क्या औरत वास्तव में केवल औरत है? ...पंडित कहेंगे औरत भटक गई है। औरत, औरत नहीं रही। हम सोचने लगते हैं कि क्या यह सब सच है? आधुनिक औरत यदि परंपरागत औरत नहीं, तो क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि आज दुनिया में औरत का सही स्थान और सही रूप वस्तुतः क्या है? वस्तुतः उसका कौन सा दर्जा होना चाहिए?
पहला प्रश्न यह उठता है कि औरत क्या है? (कोई कुछ कहेगा, कोई कुछ, लेकिन) आज की औरत की वास्तविकता कोई नकार नहीं सकता। वस्तुतः मानव-जाति में औरत का पृथक अस्तित्व एक तथ्य है। औरत मानवता का आधा हिस्सा है। यह अलग बात है कि हमे समझाया जाए कि आज नारीत्व खतरे में है। औरत को औरत होना सिखाया जाता है। औरत बनी रहने के लिए उसे अनुकूल किया जाता है। तथ्यों के विश्लेषण से यह समझ में आएगा कि प्रत्येक मादा मानव-जीव अनिवार्यतः एक औरत नहीं। यदि वह औरत होना चाहती है, तो उसे और तपने की रहस्यमय वास्तविकता से परिचित होना पड़ेगा।
प्रश्न यह उठता है कि यह नारीत्व कौन-सी गुणवत्ता है? क्या वह रेशमी आंचल फहराये जाने से ही पृथ्वी पर प्रकट हो जाती है? बहुत-सी औरतें ऐसी हैं, जो जोर-शोर से इस औरतपन को मूर्तिमान करने में लगी हुई हैं। प्रायः औरत का वर्णन अस्पष्ट और लच्छेदार भाषा में किया जाता है। यह अवधारणा अब अपना स्थान वैचारिक जगत में खो चुकी है। जीवविज्ञान और समाजविज्ञान उस अस्तित्व को एक अपरिवर्तनीय स्थिर तत्व की तरह नहीं स्वीकारते, जो आरोपित विशेषताओं को आचार संहिता का रूप देता है। जैसे यहूदी या नीग्रो होना मानव-जाति की एक विशेषता तो हो सकती है, लेकिन वह संपूर्ण मनुष्य को अपने आपमें समाहित नहीं कर सकती, उसी प्रकार औरत होना मादा मानव के संपूर्ण अस्तित्व के लिए उत्तरदायी नहीं हो जाता। विज्ञान किसी भी विशेषता को परिस्थितिजन्य एक प्रतिक्रिया के रूप में स्वीकार करता है। यदि आज नारीत्व का अस्तित्व नहीं है तो हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि ऐसा कभी था भी नहीं, किंतु तब क्या औरत शब्द का कोई विशिष्ट अर्थ नहीं? यह दृढ़ रूप से स्वीकार किया गया है कि युक्तिवाद और नामवाद के दर्शन को स्वीकार करने वालों के लिए औरत महज एक मानव जीव है, जिसे औरत शब्द से रेखांकित किया गया है।

सीमोन के सातसवाल ..................... (जवाब चाहिए)
1.अब तक जो कुछ कहा गया, क्या वह वास्तव में समस्या की सही समझ के लिए पर्याप्त है?
2.क्या औरत वास्तव में केवल औरत है?
3.आधुनिक औरत यदि परंपरागत औरत नहीं, तो क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि आज दुनिया में औरत का सही स्थान और सही रूप वस्तुतः क्या है?
4.वस्तुतः उसका कौन सा दर्जा होना चाहिए?
5. पहला प्रश्न यह उठता है कि औरत क्या है?
6.क्या वह रेशमी आंचल फहराये जाने से ही पृथ्वी पर प्रकट हो जाती है?
7.क्या औरत शब्द का कोई विशिष्ट अर्थ नहीं?

Sunday, February 24, 2008

सब देख रही है, सब जी रही है औरत


उदास सुबह










रंग-विरंगी दोपहर


सूखी शाम





(एक औरत के जीवन के इन रंगों का कोई क्या करे?)

Friday, February 22, 2008

इससे क्या फर्क पड़ता है तुम्हे


मैं औरत हूं
इसलिए हूं,
इससे क्या फर्क पड़ता है तुम्हे
कि हम हैं या नहीं भी हैं।

हम औरतें उठाती हैं सवाल
तुम करते हो ज्यादतियां और बहसें एक साथ
और हम होती हैं हैरान
या हलाल बार-बार
इससे क्या फर्क पड़ता है तुम्हें
कि हम हैं या नहीं भी हैं।

तुम रचते हो नर्क
हमारे लिए, अपने स्वर्ग के लिए,
करते हो तर्पण हमारी अस्मिता और अस्तित्व के,
बेंचते हो ऐश्वर्य और अनुभूतियां,
खरीदते रहते हो हमें
इससे क्या फर्क पड़ता है तुम्हे।

तुमने बना रखे हैं हमारे लिए
तहखानों के भीतर कई-कई तहखाने,
बुन रखी हैं कई-कई परतें,
जला रखे हैं ऊंची-ऊंची लपटों वाले अलाव,
जिसमें स्वाहा होता रहता है
हमारा सर्वस्व
इससे क्या फर्क पड़ता है तुम्हे।

...लेकिन नहीं,
अब और नहीं, इससे ज्यादा नहीं,
क्योंकि मालूम हो गई हैं हमें
तुम्हारी मर्दानगियों की हिकमतें,
पढ़ ली हैं हमनें
तुम्हारी इतनी सारी किस्से-कहानियों,
अब और कुछ
जानने-सुनने के लिए
बचा भी क्या है,
बची रह गई हैं हम और हमारी कोशिशें,
रंग लाएंगी
कभी-न-कभी, आज नहीं, तो कल
जरूर रंग लाएंगी
हमारी कोशिशों, तुम्हारी कोशिशों के समानांतर
या तुम्हारी कोशिशों के खिलाफ
गूंजेंगी हम समवेत,
जोर-जोर-से।

Thursday, February 21, 2008

ऐ लड़की तू चुप्प रह!

तुम लड़की हो,
तुम बहुत अच्छी तरह याद रखना
तुम जब घर की दहलीज़ पार करोगी
लोग तुम्हें तिरछी नजरों से देखेंगे.
तुम जब गली से होकर चलती रहोगी
लोग तुम्हारा पीछा करेंगे, सीटी बजायेंगे.
तुम जब गली पार कर मुख्य सड़क पर पहुंचोगी,
लोग तुम्हें चरित्रहीन कहकर गाली देंगे.
अगर तुम निर्जीव हो
तो तुम पीछे लौटोगी
वरना
जैसे जा रही हो, जाओगी.
(तसलीमा नसरीन)





हमारा
समाज और लड़कियों का त्याग, असल में इनका साथ चोलीदामन का है. दरअसल औरत के त्याग करने से हमारा ये समाज औरहमारे समाज के पुरुष बड़े खुश होते हैं और अपने पुरुषत्व को दुगनाहोते देख, बड़े गर्व से चलते हैं. किसी पुरुष के लिए यदि कोई स्त्री अपनेसारे रिश्ते छोड़ देती है, तो इसे देखकर वह पुरुष फूला नहीं समाता. पति को पत्नी का नौकरी करना पसंद नहीं, उसका लिखना-पड़ना पसंदनहीं और ऐसे में लड़की अपनी प्रगति के सभी रास्ते बंद कर लेती है तोपुरुष मन ही मन अत्यंत आह्लादित होता है.
जो लड़की नाचती या चित्रकारी करती है, उसका नाचना या चित्रांकन बंद करके पति महाशय बड़े गर्व के साथ कहतेहैं कि शादी के बाद उन्होंने अपनी पत्नी का नृत्य या चित्रांकन बंद करा दिया है. किसी पुरुष के कारण यदि कोईऔरत आत्महत्या करती है, तो वह पुरुष मुंह से कितना ही शोक क्यों जताये, मन ही मन नाखुश नहीं होते. पुरुषजीविका की क्षमता, व्यक्तिगत और विभिन्न तरह की प्रतिभा से परिपूर्ण हों और स्त्री अपनी प्रगति और प्रतिभा केसारे दरवाजे बंद कर, नि:स्व हो, उस पर निर्भर रहे यही हमारा भारतीय समाज
है. एक तरफा त्याग को हमारासमाज बहुत अहमियत देता है और खासकर वह त्याग किसी महिला द्वारा दिया गया हो. क्यों कि इस समाज केहाथ में बहुत सारे काले कानून हैं, जिन्हें समय और मौका देखकर औरत को नीचा दिखाने के लिए प्रयोग में लायाजाता है. पुरुष के हाथ में सामाजिक नीति और नियम के रूप में कुछ प्रतिष्ठित अन्याय और अत्याचार, कुछवैमनस्य और प्रार्थक्य हैं, जिन्हें वह प्राचीन काल से ढोता रहा है. उसके हाथ में है समाज की ओर से मिलनेवालीखुली छूट.
अपर्णा सेन की फिल्म
परमा में परमा नाम की महिला पारिवारिक यांत्रिक जीवन में पति और बच्चे को लेकर इसकदर उलझ जाती है कि उसे याद ही नहीं रहता कि वह कभी अच्छा सितार बजाती थी, कविताएं पढ़ती थी. परमाको अधेड़ उम्र में जब अपने सितार का मिज़राव मिलता है, तब उसमें ज़ंग लग चुका होता है. सास को दवा पिलाने, बच्चों का होमवर्क करवाने के अलावा यदि वह कहीं निकलती है तो वह है ज़्यादा से ज़्यादा न्यू मार्केट, मीनू का घरया फिर शीला का फ्लैट. परमा का पति भी जानता है कि उसकी पहुंच वहीं तक है. दरअसल हमारे समाज में 75 प्रतिशत औरतों की पहुंच को वहीं तक सीमित कर दिया जाता है. यद्यपि पति अपनी उड़ान के लिए लाल फीते कीकोई सीमा रखने को तैयार नहीं. परमा का पति होटल के कमरे में अपनी पीए को डिक्टेशन देने के बाद आदतनरात के खाने पर आमंत्रित करता है, जो सिर्फ खाद्य ग्रहण का आमंत्रण नहीं, बल्कि युवती के शरीर नामकखाद्य-पदार्थ का त्याग भी है.
लेकिन दूसरी तरफ परमा के किसी प्रेम में आबद्ध होते ही दोष जाता है. गैर मर्द के उसके शरीर को स्पर्श करतेही वह नख-शिख तक अपवित्र हो जाती है. पारिवारिक सीमा के बाहर किसी को प्रमे करने की स्वतंत्रता सिर्फ पुरुषको ही है, औरत के लिए उस पुरुष से बात करना भी अपराध है जिसके लिए उसके दिल में कोई सम्मान भाव भी हो. क्यों? क्योंकि नारी सिर्फ अपने पति की गुलाम है. इस गुलामी को अपर्णा सेन ने नहीं स्वीकारा. इस फिल्म केज़रिये उन्होंने समझाना चाहा है कि पुरुष ही नहीं एक स्त्री भी अपने जीवनकाल में किसी भी समय प्रेमाबद्ध होसकती है, इसमें अपराध जैसी कोई बात नहीं. कोई भी व्यक्ति किसी की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, सामाजिक संबंधतय हो जाने पर भी नहीं. लेकिन हमारा भारतीय समाज इस बात को नहीं स्वीकारता.
एक लड़की किसी बड़ी और अच्छी कंपनी में कार्यरत है, उसके काम और नाम को देखकर ही कोई लड़का उससे प्रेमकर बैठता है. लेकिन प्रेम के बाद जब शादी की नौबत आती है, तो अपने भविष्य और सपनों की बली लड़की को हीदेनी होती है. क्योंकि वह अब बच्चा पैदा करनेवाली मशीन और पति की सेविका बन गयी है. जब नौकरी का प्रसंगछिड़ता है तो लड़की कोई ना कोई बहाना बनाकर बात वहीं रोक देती है. उसकी नौकरी और लेखन सिर्फ घर कीदीवारें ही सुनती और पढ़ती हैं. कभी-कभी पति के कानों तक पहुंच कर यह आवाज भी दबा दी जाती है. औरत कीपहुंच घटते घटते इतनी कम हो जाती है कि कुछ समय बाद रुके रहने के सिवा और कोई चारा ही नहीं रहता.
अनाकांक्षा में ही जिसका जन्म
हुआ हो उसके लिए चारा भी क्या होगा. प्रसव कक्ष के बाहर इंतजार करते लोंगों मेंसे एक भी व्यक्ति नहीं चाहता कि बेटी हो. एक उच्च शिक्षित पुरुष भी एक स्वस्थ बच्चे के बजाय किसी पुत्र संतानको पाना ज्यादा पसंद करता है.