skip to main |
skip to sidebar
(www.sansadji.com सांसदजी डॉट कॉम से साभार)
कुछ मत पूछ यार, होली तो हो ली!! दीदी जैसा, दादा का बजट क्यों नहीं? लोकसभा में वित्तमंत्री द्वारा आम बजट पेश किए जाने के दौरान विपक्ष ने वॉकआउट किया तो इसमें बुरा क्या है? जिस तरह देश के अधिकांश लोग मतदान नहीं करते या कर पाते, उसी तरह ज्यादातर लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें मालूम ही नहीं कि आखिर बजट किस पखेरू का नाम है! विपक्ष भले ही राजनीतिक कारणों से सदन का वाक आऊट करे, लेकिन उस बहिष्कार में महंगाई से कुचलते-पिसते आम की कराह की भावना छिपी है, जो लच्छेदार राजनीतिक-संसदीय शब्दावलियों के धुंध से ढंकने की तब से कोशिश की जा रही है, जब से देश को आजादी मिली। वैतनिक आय पर टैक्स घटाने-बढ़ाने को लेकर हर साल आम बजट के दिनों इतनी चिल्लपों मचाई जाती है। पूरे देश का मीडिया इस मसले पर आसमान सिर पर उठा लेता है। असली सवाल ये है कि जिनके पास कोई रोजी-रोजगार ही नहीं, उनके लिए सरकार क्या सोचती है और क्या सोचते हैं वे लोग, इस बजट पर प्रतिक्रिया जताते हुए कह रहे हैं कि अब हर हफ्ते होटल-रेस्तरां घूमने से थोड़ा परहेज करेंगे, क्योंकि महंगाई बहुत बढ़ने जा रही है। दरअसल इन लोगों के दिल में भी उस आदमी के लिए कोई दर्द नहीं, इन्हें सिर्फ अपने पेट और टैक्स की पड़ी है। ये वही वर्ग है, जिसे लोन पर मकान, लोन पर गाड़ी सब कुछ चाहिए। टैक्स कम होगा तो ये वर्ग मजे से होटल-रेस्तरां जाते हुए अपने तरह तरह के लोन भी चुका सकेगा। इसी मुफ्त-भकोसू वर्ग को सबसे ज्यादा बजट की चिंता रहती है। आम आदमी तो न बजट जानता, न टैक्स, न ही उसकी कोई प्रतिक्रिया लेने जाता है। चैनल जिनकी प्रतिक्रियाएं बुद्धू परदे पर परोसते हैं, उसके किचन में झांक आइए, लाखों-करोड़ों से बनी रसोई में हजार किस्म के बर्तन मिल जाएंगे। जबकि देश की ज्यादातर आबादी के घरों में लोटा है तो गिलास नहीं, कटोरी है तो थाली नहीं। सवाल उठता है, उनके बारे में इन मध्यमवर्गीय मुस्टंडों और उनकी चिंता से दुबली हो रही सरकार का क्या सोचना है? हर साल इसी तरह बजबजाता हुआ बजट आता है, जाता है, आम आदमी बिलबिलाकर दम तोड़ता रहता है। पेट्रोल डीजल महंगा होने का मतलब है, सब कुछ महंगा। सही कहा है कि एकै साधे, सब सधै। कहा गया है एक रुपया महंगा, कोई चैनल वाला समझा रहा था कि एक नहीं, जनाब दो रुपये महंगा होगा। बुंदेलखंड के लिए जो 1200 करोड़ का ऐलान किया गया है, उस पर तितरफा (केंद्र-यूपी-एम) सरकारों में पहले से रार चल रही है। दस लाख तक कर्ज पर छूट की घोषणा की गई है। किसानों को कर्ज सस्ता मिलेगा। वाह भाई, क्या बात है! खूब कर्जा मिलेगा। ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत। कर्ज का प्रचार ऐसे किया जाता है, जैसे सरकार खैरात बांट रही हो। चलती-फिरती गृहस्थी चौपट करने का सबसे आसान तरीका है, कर्ज से लाद दो। किसानों की रही-सही भी पूरी होने वाली है, क्योंकि किसानों को 5 फीसदी पर कर्ज मिलेगा। जिस नरेगा के लिए 40 हजार करोड़ रुपये की घोषणा की गई है, वह दबंगों और भ्रष्ट अफसरों की भेंट चढ़ी हुई है। नरेगा मजदूरों के बीमा की बात कही गई है। अब और फर्जीबाड़ा होगा, क्योंकि भैया बीमा भी मिलेगा। वैसे इसके पीछे बड़ी गहरी चाल है। यही हाल ग्रामीण विकास के लिए घोषित 66 हजार करोड़ रुपये का भी होना है। शिक्षा अनुदान में 2000 करोड़ की बढ़ोतरी, स्कूली शिक्षा के लिए 31 लाख 36 हजार करोड़, स्वास्थ्य पर 22 हजार 300 करोड़ खर्च करने की घोषणाएं जरूर गुस्सा थोड़ा ठंडा करती हैं, लेकिन वित्त मंत्री खुद ही कहे जा रहे हैं कि अभी देश को मंहगाई से जूझना पड़ेगा। अभी क्या, जूझ ही रहे हैं लोग। भला कब नहीं जूझ रहे थे! क्योंकि विकास दर बढ़ाना सरकारों की पहली प्राथमिकता है। इस प्राथमिकता का वे लोग क्या करें, जिनके घर में दो जून की रोटी मयस्सर होना और मुश्किल करने का प्रणब दा ने ठोस उपाय कर दिया है। इस आम बजट पर बातें तो इतनी ढेर सारी हैं कि लिखना हो तो कई महाग्रंथ तैयार हो जाएं। फिलहाल इतना ही। सोच-सोच कर माथा भन्ना रहा है कि दीदी जैसा, दादा का बजट क्यों नहीं? उधर, दादा के बजट भाषण के दौरान खूब हगामा भी हुआ। जैसे ही उन्होंने पेट्रोल व डीजल के महंगे होने की घोषणा की, सदन हंगामे से गूंज गया। सभी विपक्षी सांसद अपने स्थान से खड़े हो गए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। इसके बाद वो सदन से वाक ऑउट करके चले गए। विपक्ष का आरोप है कि डीजल के दाम बढ़ने से महंगाई और बढ़ेगी। इस दौरान दादा बस इतना भर कहते रहे कि दाम बढ़ाया जाना जरूरी है। आम बजट पेश करने से पहले भारतीय शेयर बाजार मामूली बढ़त के साथ खुले। खबर लिखे जाने तक बंबई स्टॉक एक्सचेंज का सेंसेक्स 53.60 अंक बढ़कर 16307.8 के स्तर पर था जबकि राष्ट्रीय शेयर बाजारका निफ्टी 18 अंक की बढ़त पर था।
(www.sansadji.com सांसदजी डॉट कॉम से साभार) यह विधेयक राजनीतिक आम सहमति नहीं हो पाने की वजह से एक दशक से अधिक समय से लटका हुआ था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की एक बैठक में विधेयक को मंजूरी दी गयी। यह राज्य सभा में पहले ही रखा जा चुका है और कानून व्यवस्था एवं कार्मिक मामलों की संसदीय स्थायी समिति को भेजा जा चुका है। सूत्रों ने कहा कि विधेयक सदन की संपत्ति है, इसलिए कार्य मंत्रणा समिति इस बात पर फैसला करेगी कि अगला कदम कब उठाया जाए। समाजवादी पार्टी और राजद सरीखे कुछ दल महिलाओं के लिए आरक्षण में पिछड़े वर्ग की महिलाओं की आरक्षण की मांग रहे हैं।
पंद्रहवीं लोकसभा के पहले सत्र मे 4 जून 2009 को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में घोषणा की थी कि सरकार विधानसभाओं और संसद में महिला आरक्षण विधेयक को शीघ्र पारित कराने की दिशा में सौ दिन के भीतर कदम उठायेगी। राष्ट्रपति के अनुसार महिलाओ को वर्ग, जाति और महिला होने के कारण अनेक अवसरों से वंचित रहना पड़ता है. इसलिए पन्चायतों और शहरी स्थानीय निकाय में आरक्षण बढ़ाकर महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए अगले 100 दिन में संवैधानिक संशोधन करने के क़दम उठाए जाएँगे ताकि अधिक से अधिक महिलाएँ सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश कर सकें. सरकार अगले 100 दिनों में केंद्र सरकार की नौकरियों में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की कोशिश करेगी. इसके साथ-साथ बेहतर समन्वय के लिए महिला सशक्तिकरण पर एक राष्ट्रीय मिशन स्थापित करने का क़दम उठाया जाएगा। 15वीं लोकसभा ने कई मायनों मे इतिहास रचा है। नारी सशक्तीकरण अब राजनीतिक गलियारों का मुद्दा नही, बल्कि 15वीं लोकसभा की हकीकत है। यह पहला मौका है, जब संसद में प्रवेश करने वाली महिलाओं की संख्या 50 से अधिक है। यही नहीं सबसे बड़ी बात यह है कि भारत के इतिहास में पहली बार एक महिला को लोकसभा अध्यक्ष बनने का मौका मिला है। संसद में महिला आरक्षण का प्रश्न आज प्रत्येक व्यक्ति की चर्चाका विषय है। संसद और विधान मंडलों में महिलाओं को भी 33 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के उद्देश्य से 14वीं लोकसभा में 108वें संविधान संशोधन विधेयक ने देश के जनमत को फिर चैतन्य कर दिया था। महिलाओं को राजनीतिक सशक्तीकरण और लैंगिक असमानता दूर करने के उद्देश्य से राज्यसभा में रखा गया विधेयक इस रास्ते का पहला प्रयास नहीं था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने प्रधानमंत्रित्वक काल में भी इस मोर्चे पर चिंतन हुआ था। पंचायती राज संस्थाओं और स्थानीय निकायों को संविधान में स्थान देने की योजना बनाते समय संसद और विधान मंडलों के लिए भी ऐसे ही कदम की रूपरेखा बनी थी। बाद में प्रयास फलीभूत नहीं हुआ। देश मे आधी आबादी (महिलाएं) पिछले एक दशक से अपना प्रतिनिधित्व बढाने की मांग कर रही हैं लेकिन पुरूष प्रधान राजनीति संसद में महिला आरक्षण विधेयक पारित नहीं होने दे रही। यह अप्रत्याशित और सुखद है कि पन्द्रहवीं लोकसभा में उपेक्षित महिला वर्ग का प्रतिनिधित्व बढा है। यह पहला मौका है जब 58 महिलाएं लोकसभा में पहुंची हैं, जो अब तक का सर्वाधिक आंकडा है। इस बार कुल 556 ने चुनाव लडा था। उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा 12, पश्चिम बंगाल से 7 और राजस्थान से 3 महिला सांसद चुनी गई हैं। 14वीं लोकसभा में देशभर में 355 महिला उम्मीदवार चुनावी रणक्षेत्र में कूदी थी। इनमें से महज 45 लोकसभा में पहुंच पाई, जो 543 सदस्यीय सदन का 10 फीसदी भी नहीं है। नई लोकसभा में पिछली की तुलना में 13 महिलाएं ज्यादा है । दस साल पहले महिलाओं को विधानसभा और संसद में 33 फीसदी आरक्षण देने का शिगूफा छोडा गया। यह घोर विडंबना है कि महिला आरक्षण का ज्वलंत मुद्दा पिछले करीब एक दशक में किसी न किसी तरीके से लम्बित होता रहा है। राजनीतिक दल भी गाहे-ब-गाहे, महिला आरक्षण का राग अलापते रहे हैं। लगभग सभी पार्टियों के चुनावी घोषणा-पत्र में महिला आरक्षण पर अमल का वादा किया जाता है। प्रधानमंत्री रहते एच.डी. देवेगौडा और अटल बिहारी वाजपेयी ने महिला आरक्षण बिल पेश किया। पास कराने की कोशिश भी हुई, लेकिन सफलता नहीं मिली। सरकारें आती जाती रहीं, प्रधानमंत्री बदलते रहे। यह विधेयक 1996 से अब तक कई बार लोकसभा में पेश हो चुका है, लेकिन आम सहमति के अभाव में यह पारित नहीं हो सका। 12वीं और 13वीं लोकसभा में दो बार बिल को राजग शासनकाल में प्रस्तुत किया गया। यूपीए सरकार के कार्यकाल में महिला आरक्षण विधेयक आगे नहीं बढा। आम सहमति न बन पाने को कारण बताकर महिला विधेयक को एक प्रकार से ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। आज भी महिलाओं को संसद और विधानसभा में उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं हैं। अन्तर संसदीय संघ (इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन) के अनुसार विश्वभर की संसदों में सिर्फ 17.5 प्रतिशत महिलाएं हैं। ग्यारह देशों की संसदों में तो एक भी महिला नहीं है और 60 देशों में दस प्रतिशत से कम प्रतिनिधित्व है। अमरीका और यूरोप में बीस प्रतिशत प्रतिनिधित्व है, जबकि अफ्रीका एवं एशियाई देशों में 16 से 10 प्रतिशत। अरब देशों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सिर्फ़ 9.6 प्रतिशत है। महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के मामले में 183 देशों में रवांडा पहले नम्बर पर है। वहां संसद में 48.8 फीसदी महिलाएं हैं। संसद में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के मामले में भारत दुनिया में 134वें स्थान पर है। अधिकांश पुरूष सांसद महिला सशक्तिकरण की बात जरूर करते हैं, पर समाज की "आधी आबादी" के लिए त्याग करने के लिए तैयार नहीं हैं। इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की कथनी और करनी में अंतर दिखता है। आरक्षण न सही राजनीतिक दल महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा टिकट देने लगें तो भी महिलाओं की संख्या संसद में बढेगी। पन्द्रहवीं लोकसभा इसका उदाहरण है। भारत में महिलाओं को सम्मान और समानता की विचारधारा उतनी ही सशक्त रही है जितनी कि इनके साथ असमानता की। समय बीतने के साथ पुरुष प्रधान समाज ने ना मालूम कैसे रवैये में परिवर्तन कर लिया और नारी भी इसकी आदी हो गई। सती सावित्री, अहिल्या देवी, महारानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती, अदिति पंत, बछेंद्री पाल, किरण बेदी, कल्पना चावला भारतीय महिलाओं के रोल मॉडल हैं। वह कौन-सा कार्य है, जो 'प्रस्तावित 33 फीसदी वर्ग' ने नहीं कर दिखाया है। पंचायती राज और स्थानीय निकाय संबंधी 73वें और 74वें संविधान संशोधन विधेयक के अधिनियमित होने के बाद तो महिलाओं की आवाज इस मुद्दे पर और सशक्त हो चली है। धरातली संस्थानो में तो महिलाओं के लिए आरक्षण है, किंतु इनके लिए कानून बनाने वाले संस्थानों में नहीं। महिला आरक्षण के लिए तर्क कम वजनदार नहीं हैं। महिलाएँ, त्याग, समर्पण, संसाधनों के पुनर्चक्रण (रिसाइक्लिंग) के बेजोड़ उदाहरण सामने रखती हैं। संसाधनों का इस्तेमाल पुरुषों की तुलना मे महिलाएँ अधिक बेहतर ढंग से करती हैं। पंचायती राज संस्थानों में 'मैडम सरपंच' के लिए स्थान बनाते समय इन्हीं बिंदुओं पर गंभीरता से विचार हुआ था। अब संवैधानिक संस्थानों के लिए भी ऐसी व्यवस्था जोरदार ढंग से अनुभव हो रही है। समाज की तरह राजनीति में भी पुरुष वर्चस्व है और वर्चस्व के इस दंभ ने स्त्रियों को बढ़ने नहीं दिया। महिला अपने बल पर कहीं पर खड़ी हो, यह उसे बरदाश्त नहीं होता। महिलाओं के उत्थान के लिए यह विधेयक आवश्यक है। लेकिन इसमें भी संशय है कि यह सिर्फ आम बिल बनकर रह जाएगया महिलाओं को हक दिलाने में कारगर भी होगा। इस बिल के पेश होने के बाद उम्मीद है कि महिलाएं अब आत्मविश्वास के साथ अपने हक की मांग करें। अपने अधिकारों को कानूनी रूप से प्राप्त करने के लिए वे स्वयं आगे आएं। कितने आश्चर्य की बात है कि इतने चुनावों के बाद भी महिलाओं की सत्ता में भागीदारी नगण्य है।
संप्रग के समर्थन में राजग प्रमुख भाजपा अपना समर्थन लिए खड़ी है। वामदल भी आरक्षण विधेयक के समर्थक हैं। राजद, द्रमुक, पीएमके दलित, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए भी आरक्षण चाहता है। सपा भी कोटे में कोटे की पक्षधर है। इस विधेयक के रास्ते में कई तकनीकी परेशानियाँ हैं क्योंकि यह संविधान में संशोधन करने वाला विधेयक है. ग्यारहवीं लोकसभा में पहली बार विधेयक पेश हुआ था तो उस समय उसकी प्रतियां फाड़ी गई थीं. इसके बाद 13वीं लोकसभा में भी तीन बार विधेयक पेश करने का प्रयास हुआ, लेकिन हर बार हंगामे और विरोध के कारण ये पेश नहीं हो सका था. महिला आरक्षण विधेयक एक संविधान संशोधन विधेयक है और इसलिए इसे दो तिहाई बहुमत से पारित किया जाना ज़रूरी है.
महिला मतदाता और महिला प्रत्याशी के साथ एक और बात की चर्चा होती है, वह है राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में महिलाएं। अर्थात पार्टियां महिलाओं के जीवन में कितनी खुशहाली लाने का वादा करती हैं। यह भी सच है कि महिलाएं घोषणाएं पढकर मतदान नहीं करतीं। बहुत कम महिला मतदाताओं को चुनावी घोषणा का अर्थ पता है। दरअसल किसी भी पार्टी का घोषणा पत्र उसका ऎसा दस्तावेज होना चाहिए जो समाज के हर क्षेत्र के बारे में पार्टी का दर्शन, दृष्टि और कार्यक्रम प्रस्तुत करे। घोषणा पत्र से मनसा, वाचा, कर्मणा उसका संकल्प प्रकट हो, पर ऎसा होता कहां है। अधिकांश राजनीतिक दल स्वयं अपने घोषणापत्रों के बारे में विशेष चिंतित नहीं रहते। उन्हें भी मालूम है कि घोषणा पत्र के आधार पर उन्हें वोट नहीं मिलने वाले हैं। जहां तक इन चुनावी घोषणा पत्रों में महिलाओं के लिए की गई घोषणाओं का सवाल है- प्रमुख पार्टी (सत्ताधारी) कांग्रेस के घोषणा पत्र (2009) में सारे के सारे बिन्दु वही रहे जो वर्ष 2004 के घोषणा पत्र में थे। जैसे लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षण पहली घोषणा है। उसमें साफ लिखा था, "अगला लोकसभा चुनाव महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण मिलने के आधार पर ही करवाया जाएगा।" 2009 के चुनावी घोषणा में लिखा था- "लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने के लिए संविधान में संशोधन की कोशिश की जाएगी।" दोनों संकल्पों में विषय एक है, आस्था बदली हुई। 2004 के लोकसभा चुनाव में संकल्प था। पांच वर्षों में संकल्प पूरा करने के लिए प्रयास भी नहीं हुआ। 2009 के घोषणा पत्र में "कोशिश करने" की बात लिखी गई । अन्य 4 बिन्दु भी मिलते जुलते हैं। कमाल की बात है कि कांग्रेस के घोषणा पत्रों में महिलाओं के खाते में पांच बिन्दु ही निश्चित हैं। क्या इतने से महिलाओं की समस्याएं समाप्त हो जाएंगी? सच तो यह है कि महिलाओं की विभिन्न समस्याओं की ओर विशेष ध्यान ही नहीं दिया गया है। वरना समस्याएं स्थायी कैसे होतीं पाच वर्ष शासन करने के बाद भी लगभग उन्हीं पुराने बिन्दुओं को घोषणा पत्र में डालने की विवशता क्यों पिछली घोषणाओं में से कितनी पूरी हुई, इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। दूसरी प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी है भाजपा। इस दल ने भी संसद में महिला आरक्षण को ही प्रथम घोषणा बनाया , परन्तु भाजपा ने महिलाओं की झोली में 14 बिन्दु दिए हैं। पिछले दिनों राजस्थान, म.प्र. और छत्तीसगढ सरकारों द्वारा संचालित महिला लाभकारी योजनाओं को भी केन्द्रीय स्तर पर लेने का वादा किया गया। वहीं लैंगिग समानता के लिए समान नागरिक संहिता बनाने का वादा दुहराया गया। अन्य 12 बिन्दु भी विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के जीवन को सशक्त बनाने का संकल्प दुहराते हैं। कम्युनिस्ट पार्टी (एम) ने भी अपने घोषणा पत्र में संसद में महिला आरक्षण को ही प्राथमिकता दी थी। इनके छह बिन्दुओं में आर्थिक विकास के लिए अनुदान, बलात्कार के विरूद्ध कानून, दहेज और कन्या भ्रूण हत्या का खात्मा, महिला बजट को बढाना, विधवाओं और महिला द्वारा संचालित परिवारों को विशेष सुविधा देने के वादे दुहराए गए ।
विपक्ष का काम है कि वह संसद में सत्ता पक्ष को उसके वादों का स्मरण करवाए। एक और बात की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है। महिलाओं की क्षेत्र विशेष की समस्याएं भी होती हैं। अर्थात् उनकी सरकारों से अपेक्षाएं। इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। घोषणा पत्रों के निर्माण के पूर्व महिलाओं की प्रतिनिधियों को विश्वास में नहीं लिया जाता। उनसे संवाद ही नहीं होता। फिर तो घोषणाएं हैं, घोषणाओं का क्या जिन महिलाओं को मतदान का महत्व ही नहीं पता वे घोषणाएं जानने-समझने का अपना अधिकार भी नहीं समझतीं। यह स्थिति बदलनी चाहिए। घोषणापत्रों के निर्माण के पूर्व महिलाओं की प्रतिनिधियों को विश्वास में नहीं लिया जाता। उनसे संवाद ही नही होता। सत्य तो यह है कि महिला आरक्षण की चर्चा केवल दिखावटी है। कोई भी दल नहीं चाहता कि जिनका वे सदा से शोषण करते आए हैं वे उनके साथ आकर खड़ी हो जाए। इसी कारण २० साल से यह विषय मात्र चर्चा में ही है। ना कोई इसका विरोध करता है और ना खुलकर समर्थन। उसको लाने का सार्थक कदम तो बहुत दूर की बात है। उनको लगता है कि नारी यदि सत्ता में आगई तो उनकी निरंकुशता कुछ कम हो जाएगी, उनकी कर्कशता एवं कठोरता पर अंकुश लग जाएगा तथा महिलाओं पर अत्याचार रोकने पड़ेंगें । आज समय की माँग है कि नारी को उन्नत्ति के समान अवसर मिलें और खुशी-खुशी उसे उसके अधिकार दे दिए जाएँ। (भाषा एवं upscportal.com से साभार)
(सांसदजी डॉट कॉम www.sansadji.com से साभार)
अब अमर ने बरेली में साधा मुलामय पर निशानाः राजवीर का अमर को अपनी पार्टी में बुलावाः राज्यसभा सांसद अमर सिंह ने बरेली में क्षत्रिय महासभा तथा बरेली बार एसोसिएशन के प्रोग्राम में कहा कि मैं मुलायम सिंह से बड़ा पहलवान हूं। मुलायम अखाडे के पहलवान हैं, मैं राजनीति का। कहते हैं कि 14 साल तक वह एक सूखे तालाब में रहे। वहां तो परिवारवाद हावी है। यही चिंता की सबसे बड़ी बात है। मुलायम सिंह को परिवार के अलावा कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा है। गजराज मुलायम सिंह के दो दांत थे लेकिन अब उनमें से एक भी उनके साथ नहीं रहा। महिला आरक्षण विधेयक केंद्रीय कानून मंत्री एम वीरप्पा मोइली ने कहा है कि महिला आरक्षण विधेयक उसके मूल स्वरूप में केंद्रीय मंत्रिमंडल को भेज दिया गया है। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल कह ही चुकी हैं कि सरकार महिला आरक्षण बिल को जल्द संसद से पारित कराने के लिए संकल्पित है। मोइली कहते हैं कि संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट के हिसाब से ही महिला आरक्षण विधेयक को उसके मूल रूप में मंत्रिमंडल के पास भेजा गया है।
यह खबर विस्तार से डॉट कॉम...sansadji.com पर पढ़ी जा सकती है।
यूपी में फिर गर्माने लगी वरुण गांधी की सियासतः
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति नए सिरे से गर्माने की ओर है। एक ओर जहां भाजपा के फायर ब्रांड नेता वरुण गांधी की सभा पर रोक लगाने के सहारनपुर जिला प्रशासन के फैसले के खिलाफ भाजपा ने कमर कस ली है, दूसरी तरफ लखनऊ की सड़कों पर सत्ता से दो-दो हाथ करने के लिए सांसद एवं पूर्व पार्टी अध्यक्षद्वय राजनाथ सिंह, मुरली मनोहर जोशी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कलराज मिश्र, मुख्तार अब्बास नकवी, सांसद लाल जी टण्डन, विनय कटियार कल ललकारने वाले हैं।
मीरा कुमार चिंतित हैं संसद के मौजूदा हो-हल्ले सेः
कीमतों में वृद्धि को आम आदमी की परेशानी का मुद्दा बताते हुए लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने इस बात पर खिन्नता जताई कि इस विषय पर बुधवार को सदन में चर्चा नहीं हो पाई। मैं चाहती थी कि सदन में इस मुद्दे पर चर्चा हो, लेकिन किस नियम के तहत चर्चा कराई जाए, इसे ले कर कार्यवाही बाधित हो गई। मूल्य वृद्धि एक ऐसा मुद्दा है, जिसका लोग समाधान चाहते हैं।
केंद्रीय कानून मंत्री एम वीरप्पा मोइली ने कहा है कि महिला आरक्षण विधेयक उसके मूल स्वरूप में केंद्रीय मंत्रिमंडल को भेज दिया गया है। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल कह ही चुकी हैं कि सरकार महिला आरक्षण बिल को जल्द संसद से पारित कराने के लिए संकल्पित है। मोइली कहते हैं कि संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट के हिसाब से ही महिला आरक्षण विधेयक को उसके मूल रूप में मंत्रिमंडल के पास भेजा गया है। यह खबर
विस्तार से डॉट कॉम...sansadji.com पर पढ़ी जा सकती है। इसके अलावा इस न्यूज पोर्टल पर ये भी पढ़ा जा सकता है............अब अमर ने बरेली में साधा मुलामय पर निशानाः राजवीर का अमर को अपनी पार्टी में बुलावाः राज्यसभा सांसद अमर सिंह ने बरेली में क्षत्रिय महासभा तथा बरेली बार एसोसिएशन के प्रोग्राम में कहा कि मैं मुलायम सिंह से बड़ा पहलवान हूं। मुलायम अखाडे के पहलवान हैं, मैं राजनीति का। कहते हैं कि 14 साल तक वह एक सूखे तालाब में रहे। वहां तो परिवारवाद हावी है। यही चिंता की सबसे बड़ी बात है। मुलायम सिंह को परिवार के अलावा कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा है। गजराज मुलायम सिंह के दो दांत थे लेकिन अब उनमें से एक भी उनके साथ नहीं रहा। संसद से प.बंगाल तकः आज दौड़ेगी दीदी की रेलः रेल मंत्री ममता बनर्जी आज वर्ष 2010-11 का रेल बजट परोसने जा रही हैं। चर्चाएं हैं कि लीक हो गया बजट, लीक हो गया? खैर, ऐसी सूचनाओं की जानकारी न भी रखें तो पता चलता है कि रेल बजट पर केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के हस्ताक्षर कराने में इस बार रेलमंत्री को भारी जिच झेलनी पड़ी। केंद्र की मिलीजुली सरकार की प्रतिबद्धता में प्रणब दा ने न चाहते हुए भी ममता के 24 रेल प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी। यूपी में फिर गर्माने लगी है वरुण गांधी की सियासतः उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति नए सिरे से गर्माने की ओर है। एक ओर जहां भाजपा के फायर ब्रांड नेता वरुण गांधी की सभा पर रोक लगाने के सहारनपुर जिला प्रशासन के फैसले के खिलाफ भाजपा ने कमर कस ली है, दूसरी तरफ लखनऊ की सड़कों पर सत्ता से दो-दो हाथ करने के लिए सांसद एवं पूर्व पार्टी अध्यक्षद्वय राजनाथ सिंह, मुरली मनोहर जोशी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कलराज मिश्र, मुख्तार अब्बास नकवी, सांसद लाल जी टण्डन, विनय कटियार कल ललकारने वाले हैं। मीरा कुमार चिंति हैं संसद के मौजूदा हो-हल्ले सेः कीमतों में वृद्धि को आम आदमी की परेशानी का मुद्दा बताते हुए लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने इस बात पर खिन्नता जताई कि इस विषय पर बुधवार को सदन में चर्चा नहीं हो पाई। मैं चाहती थी कि सदन में इस मुद्दे पर चर्चा हो, लेकिन किस नियम के तहत चर्चा कराई जाए, इसे ले कर कार्यवाही बाधित हो गई। मूल्य वृद्धि एक ऐसा मुद्दा है, जिसका लोग समाधान चाहते हैं। सोरेन पहुंचे चिदंबरम से मिलने दिल्ली...सांसदों का बंगला क्यों नहीं छोड़ रहे वे नेता या उनके परिजन!
sansadji.com (सांसदजी डॉट कॉम से साभार)रेल मंत्री ममता बनर्जी बुधवार को वर्ष 2010-11 का रेल बजट परोसने जा रही हैं। चर्चाएं ऐसी भी हैं कि लीक हो गया बजट, लीक हो गया? खैर, ऐसी सूचनाओं की जानकारी न भी रखें तो पता चलता है कि रेल बजट पर केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के हस्ताक्षर कराने में इस बार रेलमंत्री ममता बनर्जी भारी मशक्कत झेलनी पड़ी। केंद्र की मिलीजुली सरकार की प्रतिबद्धता में प्रणब दा ने न चाहते हुए भी ममता के 24 रेल प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी। जिनको वे सरकारी खजाने से एक कौड़ी भी देने को राजी नहीं थे। ममता और प्रणब के बीच मची खींचतान खुद प्रधानमंत्री की दखल से खत्म हुआ। दीदी अपने बजट में यात्रियों को कई नई सौगातें दे सकती हैं जिसमें दुरांतो ट्रेन के अलावा कई नई ट्रेनों के शुरू किए जाने की भी उम्मीद है। बजट लोकलुभावन हो सकता है। भले रेलवे बोर्ड के अधिकारी यात्री किराए में बढ़ोतरी के पक्ष में हों, यात्री किराया शायद ही बढ़े! रेल मंत्री यात्री किराया बढ़ाने के खिलाफ हैं। पिछले साल जुलाई में रेल मंत्री की अपनी दूसरी पारी के पहले बजट में ममता ने यात्री किराये और माल भाड़े में किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं की थी। रेलवे के साथ दुखद यह है कि इससे पिछले साल रेल मंत्री लालू प्रसाद ने भी चुनावी साल की वजह से किरायों में बढ़ोतरी नहीं की थी। इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले 2 साल से रेलवे के किराये बढ़ोतरी से हासिल होने वाले अडिशनल रेवेन्यू में किसी तरह का इजाफा नहीं हो पाया है। पिछले 2 साल में रेलवे से माल की आवाजाही और पैसेंजर्स ट्रैफिक में काफी बढ़ोतरी हुई है, पर 9 परसेंट की ऊंची महंगाई दर की वजह से इस अतिरिक्त मुनाफे का कुछ खास असर नहीं दिख पाया है। दिलचस्प यह है कि लालू प्रसाद या ममता बनर्जी को किसी ने आम आदमी पर 'मेहरबानी' दिखाने, धड़ल्ले से नई योजनाएं शुरू करने, अपने-अपने चुनावी क्षेत्रों में नई ट्रेनों की संख्या या फ्रीक्वेंसी बढ़ाने से जुड़े कदम उठाने से किसी ने रोका भी नहीं। ऐसे हालत में जाहिर है कि इस बार जब रेल बजट पेश किया जाएगा तो रेल मंत्री को कई तरह की चुनौतियों से दो-चार होना होगा। रेलवे रोजाना 20 लाख टन माल और 1 करोड़ 80 लाख पैसेंजर्स ढोता है। रेलवे के रेवेन्यू का 70 परसेंट हिस्सा माल भाड़े और बाकी 30 परसेंट पैसेंजर्स किराये से आता है। 2009-10 के लिए पैसेंजर किराये से होने वाली आमदनी 25 हजार करोड़ रुपये रहने के आसार हैं, जो 2008-09 में 22 हजार 330 करोड़ रुपये थी। पर मौजूदा चलन को देखते हुए ममता बनर्जी शायद ही पैसेंजर्स किराये में कोई बढ़ोतरी करें। ऐसे में रेलवे का रेवेन्यू बढ़ाने के लिए रेल मंत्री के पास माले भाड़े में थोड़ी बढ़ोतरी करनी होगी। साल 2007-08 में रेलवे ने 794.21 मिलियन टन माल ढोया। उसके अगले साल यानी 2008-09 में इसमें करीब 7 परसेंट की बढ़ोतरी हुई और यह 850 मिलियन टन हो गया। कारोबारी साल 2009-10 में इसके 882 मिलियन टन का टारगेट रखा गया है। 2009-10 के लिए माल भाड़े से होने वाली आमदनी का लक्ष्य 59 हजार 59 करोड़ रुपये रखा गया है, जो 2008-09 में 54 हजार 293 करोड़ रुपये था। पिछले साल (2009-10) इकॉनमी के मंदी की गिरफ्त में होने की वजह से माल भाड़े में बढ़ोतरी नहीं की गई। पर इस बार हालात सुधरे हैं और माल भाड़े में बढ़ोतरी की जानी चाहिए। लौह अयस्क, कोयला और सीमेंट को छोड़कर शेष वस्तुओं के मालभाड़े में 5-10 फीसदी की बढ़ोतरी की जा सकती है। रेल मंत्री अपने राज्य पश्चिम बंगाल में नई ट्रेने बढ़ाने की घोषणा भी कर सकती हैं। बताते हैं कि कुछ नए सुरक्षा उपायों की घोषणा भी हो सकती है। एसी-3 टीयर डिब्बों की संख्या बढ़ाई जा सकती है, क्योंकि पिछले महीने तक यात्री संख्या 21.01 फीसदी बढ़कर 3.68 लाख तक पहुंच चुकी थी। वातानुकूलित श्रेणी वाले यात्रियों से रेलवे को कुल 3.116 करोड़ रूपए की कमाई हुई थी। बुधवार को रेल बजट में नए एनक्वायरी नंबर 138 की घोषणा भी संभावित है। हालांकि ये नंबर टोल फ्री नहीं होगा। देखिए क्या होता है कल दीदी के पिटारे में। रेलवे के लाखों कर्मचारियों के अलावा पूरे देश की टकटकी कल छुकछुक बजट पर होगी।
बजट सत्र सोमवार से, विपक्ष ने कमर कसी, पीएम और पवार ने कहा- हम मुकाबले को तैयारः सोमवार से शुरू हो रहे संसद के बजट सत्र में कीमतों में वृद्धि पर घेरने के लिए विपक्षी दलों के कमर कसने के बीच केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा है कि वह उन हमलों का सामना करने के लिए तैयार हैंसरकार का पसीना छुड़ाने के लिए यह तथ्य काफी है कि भाजपा, सपा और वाम दलों सहित तमाम विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर अपने सियासी मतभेद भुला दिए हैं। विपक्ष राष्ट्रपति के अभिभाषण के अगले दिन, यानी मंगलवार को महंगाई पर चर्चा के लिए नियम 193 के तहत प्रश्नकाल स्थगन का नोटिस दे चुका है। तय कार्यक्रम के मुताबिक 24 फरवरी को लोकसभा में रेल बजट और 26 को आम बजट पेश होना है। विपक्ष के निशाने पर आ चुके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि सरकार संसद में सभी मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार है। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार द्वारा सोमवार से शुरू हो रहे संसद के बजट सत्र से पहले बुलाई गई राजनीतिक दलों के नेताओं की बैठक के बाद मनमोहन सिंह ने साफ कर दिया है कि हम संसद में सभी मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार हैं। सत्र की कार्यवाही सोमवार 22 फरवरी को दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के संबोधन के साथ शुरू होगी और यह सत्र सात मई तक चलेगा। सरकार 2010-11 का आम बजट 26 फरवरी को पेश करेगी जबकि रेल बजट 24 फरवरी और आर्थिक समीक्षा 25 फरवरी को पेश की जाएगी। स्थाई समितियों को विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की अनुदान मांगों पर विचार कर रपट तैयार करने का समय देने के लिए लोकसभा की कार्यवाही 16 मार्च को स्थगित रहेगी और 12 अप्रैल को फिर से बैठक शुरू होगी। राज्यसभा की कार्यवाही भी 22 फरवरी से ही शुरू होगी। कृषि मंत्री पवार का कहना है कि मैं जानता हूं कि कई विपक्षी नेता चीनी की कीमतों पर मुझे निशाना बनायेंगे लेकिन मैं अच्छा खिलाड़ी हूं और इन हमलों का सामना करने को तैयार हूं। केन्द्रीय कृषि मंत्री ने यूरिया के दामों में बढ़ोत्तरी पर सफाई देते हुए कहा कि यूरिया खाद के दाम वर्ष 2002 से नहीं बढ़ाए गए थे। शोलापुर में उनकी पार्टी राकांपा के कार्यालय का वर्ष 2002 में जब उद्घाटन हुआ था, तब से यूरिया के दामों में बढ़ोत्तरी नहीं हुई थी। यूरिया के दामों को बढ़ाना सरकार के लिए अपरिहार्य हो गया था। सरकार इस चिंता से भी दुबली हुई जा रही है कि अगले साल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के मद्देनजर तृणमूल नेता ममता बनर्जी महंगाई पर भी कोई तीखी टिप्पणी न कर बैठें। वाम गठबंधन की रणनीति है कि कांग्रेस और तृणमूल में दो-दो हाथ हो जाए। आगामी रेल बजट में रेल यात्री किराए में बढ़ोतरी की आशंकाओं के बीच मालभाड़े को युक्तिसंगत बनाने के लिए इसमें भी 10 से 15 प्रतिशत की वृद्धि की संभावना व्यक्त की जा रही है। फिर भी कैबिनेट की बैठक में झड़प के बाद माना जा रहा है कि आगामी रेल बजट में किराया-भाड़े में कोई रद्दोबदल शायद ही हो। दो-तीन दिन पूर्व आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की बैठक में रेलवे की उन डेढ़ दर्जन परियोजनाओं पर चर्चा हुई जिन्हें आगामी रेल बजट में शामिल किया जाना है। इनमें से ज्यादातर वे लोकलुभावन परियोजनाएं थीं जिनकी घोषणा ममता रेल बजट में करना चाहती हैं। इनमें से कई योजनाओं का संबंध पश्चिम बंगाल से है, जहां उनकी निगाह राइटर्स बिल्डिंग पर है। सूत्रों के मुताबिक चर्चा के दौरान वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने ममता से कहा कि इन परियोजनाओं के लिए पैसा जुटाने के लिए रेलवे को किराया-भाड़ा बढ़ाना होगा। वैसे न तो रेलवे की वित्तीय स्थिति अच्छी है और न ही सरकार के पास इतना पैसा है कि इन परियोजनाओं के लिए धन मुहैया कराया जाए। सूत्रों के अनुसार इस पर ममता भड़क गई। उन्होंने कहा कि किसी भी कीमत पर किराया-भाड़ा नहीं बढ़ेगा और इन परियोजनाओं की मंजूरी भी जरूरी है। इस पर प्रणब को गुस्सा आ गया और उन्होंने उनको यह कहते हुए डांट लगा दी, किराया-भाड़ा नहीं बढ़ाना है तो रेलवे को परियोजनाओं के लिए पैसों का इंतजाम भी खुद करना होगा। सरकार कोई मदद नहीं करेगी। कल रेल मंत्री ने केन्द्र में सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन(यूपीए) सरकार के साथ किसी मतभेद से इनकार करते हुए दो टूक कहा कि उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीसी) पांच सालों तक सरकार में शामिल रहेगी। उधर, विपक्ष की ओर से सरकार का पसीना छुड़ाने के लिए इतना काफी लगता है कि भाजपा, सपा और वाम दलों सहित तमाम विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर अपने मतभेद ताक पर रख दिए हैं। सरकार के रणनीतिकार महंगाई पर गरमा रही राजनीति में विपक्षी दलों के बाजी मारने की कोशिश से ज्यादा चिंतित है। सरकार को चिंता है कि इस मुद्दे पर उसके कई सहयोगी भी विपक्ष के पाले में नजर आ सकते हैं। लोकसभा अध्यक्ष ने बैठक यह सुनिश्चित करने के लिए बुलाई थी कि बजट जैसे अहम कामकाज को अंजाम देने में कोई बाधा ना हो। लेकिन नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज हों या फिर वामदल नेता बासुदेव आचार्य और गुरुदास दासगुप्ता, सभी ने एक सुर में बजट सत्र में सबसे पहले महंगाई पर चर्चा कराने के लिए दबाव बनाया। संकेत साफ हैं कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद अगर संसद चलेगी तो महंगाई पर चर्चा के बाद ही। विपक्ष के पास महंगाई का मुद्दा तो पुराना है, पाकिस्तान को वार्ता की पेशकश और पुणे ब्लास्ट के रूप में विपक्ष के पास ताजा मसले भी हैं। यूरिया की कीमतों में बढ़ोतरी के सरकार के फैसले पर भी सपा और वामदलों की त्यौरियां चढ़ी हुई हैं। पारिख समिति और रंगनाथ आयोग की रिपोर्टो, माओवाद की समस्या, आतंरिक सुरक्षा, जम्मू-कश्मीर की स्वायत्ता पर सगीर अहमद की रपट,असंगठित क्षेत्र के कामगारों की स्थिति, आदि सदन को गरमा सकते हैं। उधर, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार हंगामे के बावजूद प्रश्नकाल पूरा कराने के उपाय तलाश रही हैं। इस सिलसिले में संसदीय कार्य मंत्री के साथ उनकी बातचीत भी हुई है। हाल में ही लोकसभा नियमों में सुधार कर यह सुनिश्चित किया गया है कि प्रश्न पूछने वाले सदस्य के मौजूद नहीं होने पर भी उससे संबद्ध मंत्री जवाब देंगे। शीत सत्र के दौरान लगातार सवाल पूछने वाले सांसदों की गैरहाजिरी के चलते प्रश्नकाल खूब प्रभावित हुआ था। मीरा कुमार ने इसे गंभीरता से लिया था और नियमों में संशोधन करा यह तय करा दिया कि सांसद के नहीं होने पर भी प्रश्न का जवाब होगा। यही वजह है कि नियम में इस ताजा संशोधन के बाद मीरा कुमार की कोशिश है कि प्रश्नकाल पर आंच ना आए। तेलुगू देशम पार्टी के नेता नामा नागेश्वर राव ने महंगाई के मुद्दे पर सरकार की ओर से श्वेत पत्र पेश किए जाने की मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि बेरोजगारी, किसानों के समक्ष उत्पन्न संकट और इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन जैसे मसलों पर पार्टी चर्चा चाहती है। द्रमुक के टी के एस एलनगोवन ने कहा कि महंगाई पर केवल चर्चा कराने से काम नहीं चलेगा। मूल्य नियंत्रण के लिए व्यापक कानून लाए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा को वापस राज्यों की सूची में डाला जाना चाहिए और सरकार को कम से कम इस सत्र में इस संबंध में कोई विधेयक नहीं पेश करना चाहिए। अन्नाद्रमुक के एम थंबी दुरई ने महंगाई, किसानों विशेषकर गन्ना किसानों की समस्याओं, आतंकवाद सहित कानून व्यवस्था की स्थिति पर चर्चा कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि संसद या विधानसभाओं के सत्र के दौरान उपचुनाव नहीं होने चाहिए क्योंकि कई सदस्य ऐसा होने पर सदन की कार्यवाही में शामिल नहीं हो पाते हैं। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार कहती हैं कि मैं चाहूंगी कि बजट सत्र के दौरान सदन की 35 बैठकों में हर दिन का कामकाज सुचारू रूप से निपटे। ग्यारह से बारह बजे तक होने वाला प्रश्नकाल अगर किसी कारण से स्थगित हो जाता है तो यह लोकसभा अध्यक्ष का विशेषाधिकार होगा कि वह उसी दिन किसी और समय में प्रश्नकाल का कार्यवाही की इजाजत दे सकती हैं। यह ध्यान दिलाने पर कि कई सांसदों ने अभी 90 दिन के भीतर संपत्ति का ब्यौरा देने के नियम का पालन नहीं किया है, मीरा कुमार ने कहा कि ज्यादातर ने दे दिया है कुछ ही रह गए हैं। ऐसे सांसदों को इस संबंध में पत्र लिखा गया है और उम्मीद है कि सभी सांसद अपनी संपत्ति का ब्यौरा दे देंगे। इस सवाल पर कि क्या भाजपा संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी के सदन में बैठने का स्थान तय हो गया है, लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि व्यवस्था हो गई है और सीटों की व्यवस्था में परिवर्तन किया गया है। आडवाणी के लिए दूसरा स्थान तय किया गया है। उर्वरक एवं रसायन मंत्री एम के अलगिरि द्वारा सदन में हिंदी या अंग्रेजी में नहीं बोल पाने के बारे में किए गए सवाल पर मीरा कुमार ने कहा कि उन्हें आकर मुझसे मिलना चाहिए ताकि मुझे पता लगे कि समस्या क्या है। उन्होंने कहा कि तमिल सहित 14 क्षेत्रीय भाषाओं में सदस्य या मंत्री बोल सकते हैं लेकिन उसके लिए पहले उन्हें नोटिस देना होगा और अध्यक्ष की अनुमति लेनी होगी ताकि दुभाषियों की व्यवस्था की जा सके। यह सुविधा पहले से ही है। तेलंगाना मसले पर कांग्रेस के सांसद एल राजगोपाल द्वारा दिया गया इस्तीफा मंजूर किए जाने के बारे में पूछे गए सवाल पर मीरा कुमार ने कहा कि उन्होंने अपना इस्तीफा वापस ले लिया है।
अमेरिका से लेकर जापान-आस्ट्रेलिया तक, इंग्लैंड से लेकर दक्षिण अफ्रीका तक, हर महाद्वीप की हर किशोरी निशाने पर है। निशाना साध रही हैं, दो बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां। जहां मर्क के पास गार्डासिल है तो ग्लेक्सो स्मिथ क्लाइन के पास सर्वेरिक्स। ये टीके हैं। हर इंजेक्शन की कीमत तीन हजार रुपये से अधिक है और इन्हें हर लड़की को तीन बार दिया जाना है। इनका प्रचार इन्हें गर्भाशय के मुखद्वार पर होने वाले कैंसर से बचाव का टीका कहकर किया जा रहा है।
सन 2006 से ये टीके अमीर देशों की लड़कियों को, विशेषकर आस्ट्रेलिया, अमेरिका व इंग्लैंड में व्यापक रूप से लगाए गए और 2009 में इनकी घुसपैठ भारत में भी हो चुकी है। विकसित देशों में पहले बाजार गर्म हुआ। आखिर कौन अपनी बच्ची को कैंसर से नहीं बचाना चाहेगा? साथ ही दोनों कंपनियों ने सरकार से पैरवी करने व डॉक्टरों को प्रभावित करने का कोई उपाय नहीं छोड़ा। दो साल में इन टीकों के कई विपरीत असर भी सामने आए। संदिग्ध हालात में कुछ स्वस्थ लड़कियां मौत, गठिया, लकवे, निरंतर कमजोरी, थकान की शिकार हुईं, अस्पताल में भर्ती हुईं, बेहोशी और मिर्गी के दौरे आए, थक्के जमने से रक्ताघात हुआ। यह हाल बिरली नहीं, टीके लेने वाली 50 प्रतिशत लड़कियों का रहा, जिनमें से सात प्रतिशत गंभीर पाई गईं। नतीजतन दो साल में बिक्री घट भी गई और अब कंपनियां तीसरी दुनिया की ओर रुख कर रही हैं।
ताज्जुब है कि इसे कैंसर से बचाव का टीका कहा जा रहा है। वास्तव में यह कैंसर के कई कारकों में से एक, ह्यूमन पेपिलोमा वाइरस (एचपीवी) आंशिक रूप से ही बचाव कर सकता है। इस वायरस की 100 से भी अधिक प्रजातियां हैं और उनमें से 13 कैंसर रोगियों में पाई जाती हैं। कथित रूप से प्रजाति संख्या 16 व 18 सत्तर प्रतिशत केसों में मिलती हैं और इन्हीं दो के संक्रमण से ये टीके बचाव करने की क्षमता रखते हैं। पर यह नहीं मालूम कि टीके के बाद बचाव कितनी अवधि तक कायम रहेगा। क्या यह भी संभव है कि बाकी प्रजातियां अधिक हावी हो जाएं और कैंसर कम होने की संभावना ही न बनने दे! ये सवाल स्वयं अमेरिका की लाइसेंस देने वाली एजेंसी ने उठाए हैं, लेकिन अफसोस, लाखों टीके लगाए जाने के बाद।
एक बार फिर इन टीकों की सीमा पर गौर करें तो हम पाते हैं कि टीके की परिकल्पना में गर्भाशय के मुखद्वार के कैंसर को पूरी तरह वायरस जनित मान लिया गया है। यह गलत है क्योंकि यौन आचरण, धूम्रपान, एड्स, खान-पान में कमी आदि से भी यह कैंसर संबंध रखता है। दूसरी अवधारणा में कमी यह है कि इस वायरस को पूर्णतया यौनबाधित रोग के रूप देखा जा रहा है। ऐसे में यह रणनीति बनाई गई है कि यौन संबंध शुरू होने के पहले किशोरावस्था में ही टीका लगा दिया जाए तो लड़कियां संक्रमण व अंततः कैंसर से बची रहेंगी।
गर्भाशय का कैंसर आम तौर पर 48-50 वर्ष की उम्र में होता है। अगर वयस्क औरतें नियमित रूप से जांच कराती रहती हैं तो कैंसर के पूर्व की अवस्था ही पकड़ में आ जाती है और आसानी से अधिकांश केसों में कैंसर की नौबत नहीं आती। इसके लिए पैप स्मीअर नाम की जांच की जाती है, जो 90-95 प्रतिशत सही बैठती है व जिस पर 500-700 रुपये तक खर्च आता है। अगर कोई लड़की आज टीका लगवा भी लेती है तो उसे बाद में पैप स्मीअर तो कराना ही होगा, क्योंकि मात्र दो वाइरस प्रजातियों से ही उसे सुरक्षा मिलेगी। यहां यह जानना भी जरूरी है कि प्रायः हर औरत को यह वाइरस ग्रस्त करता है पर इसके कोई लक्षण नहीं हैं व आमतौर पर संक्रमण अपने आप ठीक भी हो जाता है। ऐसे में टीकों की सार्थकता नापने के लिए हमें उस पर होने वाले खर्च व उसके विपरीत असर की तुलना कैंसर केसों में आने वाली कमी व रोग निदान पर घटे हुए खर्च से करनी होगी।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि आज इसे 10-15 वर्ष की लड़की को लगाया जाएगा, जिसे शायद उसका फायदा तीस साल बाद मिलेगा। ऐसे में टीके के विपरीत असर पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है। शरीर के हर तंत्र व प्रक्रिया पर इसके असर पाए गए हैं। दिमाग, रक्त, मांसपेशियां, स्नायुतंत्र, रोग प्रतिरोधक प्रणाली, श्वसन प्रणाली सभी को ये टीके प्रभावित करते हैं। अमेरिका में सरकार ने एक संस्थान सुनिश्चित कर रखा है, जिसके जरिये लोग स्वेच्छा से टीकारण के बुरे परिणाम दर्ज कराते हैं। एचपीवी के टीकों के बुरे परिणाम बड़ी संख्या में इसमें दर्ज हुए। कुल बुरे परिणामों के 25 प्रतिशत केस महज गार्डासिल के थे। गार्डासिल की तुलना में दूसरे टीकों की संख्या बहुत ही ज्याद है। उदाहरण के लिए बच्चों को 48 टीके लग रहे हैं। बचपन की बीमारियों के लिए। साथ ही, यह भी देखना जरूरी है कि दूसरे टीकों की अपेक्षा इसमें गंभीर असर कितने ज्यादा हैं। दिमागी ज्वर के टीके की तुलना में गार्डासिल से खून में थक्के जमने और हृदयाघात की आशंका चारगुना, सदमे की 15गुना और लूपस (चर्म यक्षमा) की 33 गुना ज्यादा हो जाती है।
जो टीका शरीर की हर प्रणाली को गड़बड़ा देता है, क्या उससे प्रजनन प्रणाली अछूती रहेगी? हालांकि मर्क ने यह देखना तक जरूरी नहीं समझा कि मां के दूध से टीके के अंश बच्चों तक किस मात्रा में पहुंचते हैं व क्या असर डालते हैं। छोटे बच्चों की बात करना जरूरी है क्योंकि 0-8 साल पर शोध नहीं किया गया है। फिर भी शोध के दौरान यह टीका धात्री माताओं को दिया गया और तत्काल असर श्वसन प्रणाली पर तो नजर आ गया क्योंकि ऐसे बच्चों को फेफड़ों के ज्यादा संक्रमण हुए। इन टीकों को लाइसेंस 9-27 वर्ष की उम्र की लड़कियों व औरतों के लिए मिला हुआ है। यहीं नहीं, कई गर्भवती औरतों को भी शोध में पर्याप्त सावधानी न रखने के कारण यह टीका लगा दिया गया और पाया गया कि अगर गर्भ धारण व टीके लगने के बीच तीस दिन का ही अंतर था तो बच्चों में जन्मजात विकृतियां बढ़ गईं। इन औरतों में स्वतः स्फूर्त गर्भपात भी अधिक हुए। चूंकि रणनीति किशोरियों के टीकाकरण की है, यह सवाल भी महत्व रखता है कि हर प्रणाली को प्रभावित करने वाला यह टीका विकसित हो रही प्रजनन प्रणाली पर क्या असर डाल सकता है। इस बारे में अभी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। अर्थात बात करोड़ों लड़कियों द्वारा आज व निकट भविष्य में गंभीर खतरे मोल लेकर उन्हें एक प्रकार के कैंसर से आंशिक बचाव करने के टीकारण की है। अगर यह कैंसर बहुत ज्यादा मात्रा में पाया जाता तो शायद इस टीकारण को तार्किक ठहराया भी जा सकता। बहरहाल, गर्भाशय के मुख कैंसर की गिनती भारत के प्रमुख कैंसरों में नहीं आती व औरतों के कैंसर में भी इसका नंबर स्तन कैंसर के पीछे ही है।
तब सवाल उठता है कि यह व्यापक खिलवाड़ कौन कर रहा है, और लड़कियों को नहीं, तो किसे इन टीकों से फायदा हो रहा है? ग्लेक्सोस्मिथक्लाइन व मर्क दोनों ही कंपनियों ने यह तकनीक अमेरिका के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट से खरीदी है। फर्क सिर्फ इतना है कि मर्क की गार्डासिल में दो घटक दो प्रकार के एचपीवी से बचाव करते हैं, जो कैंसर से संबंधित हैं और दो प्रकार के उन एचपीवी से बचाव करते हैं जो जननांगों के मस्सों से संबंधित हैं। ग्लेक्सोस्मिथक्लाइन का सर्वेरिक्स नामक टीका मात्र दो कैंसर वाले एचपीवी से बचाव करता है। दोनों टीके अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए एल्युमिनियम का सहारा लेते हैं। अतः इनके विपरीत असर भी एक-से हैं। ये कंपनियां प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं, क्योंकि इनके बीच पहले से ही मुनाफा बांटने का करार हो रखा है। अर्थात एक बेचे या दूसरा, फायदा दोनों को ही होना है। इसके अलावा मर्क ने उत्पादन प्रक्रिया आस्ट्रेलिया की एक कंपनी से तैयार करवाई। मुनाफे का एक अंश सीएसएल लिमिटेड नामक इस कंपनी को व एक अंश नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट को भी जाता है।
मर्क ने अमेरिका में गार्डासिल का प्रचलन बढ़ाने के जबरदस्त कदम उठाए। यहां तक कि कुछ राज्यों ने तो इसे अनिवार्य भी बना दिया कि टीके लगवाए बगैर छठीं कक्षा में भर्ती नहीं होगी, अमेरिकी नागरिकता नहीं मिलेगी आदि। इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया के साथ-साथ यूरोप के कई देशों में सरकारी तंत्र को काबू में करके इन टीकों का बाजार तेजी से विकसित किया गया। डॉक्टरों को प्रलोभन दिए गए, नारी समूहों को अनुदान दिया गया, यहां तक कि मर्क की सहायक यूरोपीय कंपनी ने तो इस टीके से संबंधित वैज्ञानिक को चिकित्सा का नोबल पुरस्कार दिलाने तक की पैरवी कर डाली। मर्क की हड़बहड़ी की वजह उसके भूतकाल के काले कारनामे थे। 1999 में उसने गठिया रोग के दर्द निवारण की एक खतरनाक दवा, जानबूझ कर खतरे छिपाते हुए बाजार में लाई थी, जिसके कारण कई लोग हृदयाघात के शिकार हुए थे। उनके दावों से मर्क को करोड़ों का नुकसान हुआ था। पैसों की अन्य कई गड़बड़ियों के कारण अमेरिका के कर विभाग से भी केस दबवाने के लिए उसने सैकड़ों करोड़ का समझौता किया था। मरीजों के दावों व टैक्स संबंधी करार ने मर्क की हालत पतली कर दी थी और ऊपर से उसकी अच्छी बिक्री वाली दवाओं के पेटेंट भी समाप्त हो रहे थे। ऐसे में गार्डासिल ही उसकी नैया पार कर सकती थी। हर मोड़ पर मर्क ने हर प्रकार के दांव-पेच लगाए। जहां आम टीकों को लाइसेंस मिलने में तीन साल लग जाते हैं, वही गार्डासिल का लाइसेंस छह महीने में मिल गया। बाजार में आते ही उसका कैंसर के बचाव की दवा के रूप में झूठा प्रचार किया गया। गर्भाशय के मुख कैंसर के खतरे को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया। अमेरिका में टीकों की कीमत सेंटर फार डिजीज कंट्रोल (बीमारी नियंत्रक केंद्र) करता है। गार्डासिल की कीमत तय करने के लिए खर्च को आधार नहीं बनाया गया वरन गार्डासिल से बनने वाली अनुमानित बीमारी पर आज हो रहे खर्च में बचत के आधार पर उसकी कीमत तय की गई। जब गार्डासिल के विपरीत असर सामने आने लगे तो फिर सेंटर फार डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) हरकत में आया और उसने कह दिया कि विपरीत असर से गार्डासिल का कोई संबंध नहीं है। क्या सच था, क्या झूठ, यह तो शायद कभी बाहर नहीं आएगा पर ओबामा के राष्ट्रपति बनने पर सीडीसी की प्रमुख ने अपना पद छोड़ दिया व 21 दिसंबर 2009 को वह मर्क की मार्केटिंग की प्रमुख बना दी गईं।
जितनी तेजी से गार्डासिल ने पेंगें भरीं, उतनी ही तेजी से अमेरिका में वह पलटी भी खाने लगी। सन 2009 में उसकी बिक्री में 30 प्रतिशत गिरावट दर्ज हुई। टीके के बाजार की दो खूबिया हैं। पहली तो यह कि वह व्यापक है। दवा तो सिर्फ बीमार खाते हैं। टीका तो हर किसी को लग जाता है। दूसरे अमेरिका के टीके संबंधी उत्तरदायित्व के कानून कंपनियों के हित में हैं। गलत टीके का हर्जाना कंपनी नहीं भरती, सरकार देती है और उसे उपभोक्ताओं से ही बटोरा जाता है।
विकसित देशों में दाल न गलती नजर आने से अब ध्यान तीसरी दुनिया, यानी भारत जैसे विकासशील देशों पर केंद्रित किया जा रहा है। जनहित में जारी ग्लेक्सोस्मिथक्लाइन के बड़े-बड़े टीवी व अखबारों में जारी विज्ञापन सभी ने देखे होंगे। ये उन उपभोक्ताओं पर केंद्रित हैं, जो हजारों में खर्च कर सकते हैं। बाकी 90 प्रतिशत आबादी तक पहुंचने में बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन मदद कर रहा है। आज-कल हमारी सरकार आंध्र प्रदेश व गुजरात के आदिवासी इलाकों में गार्डासिल लगाने के लिए अध्ययन कर रही है। देश के दस बड़े संस्थान इस शोध की तैयारी में हैं कि क्या तीन के बदले दो इंजेक्शन से काम चल जाएगा। सारा विवेक ताक पर रख दिया गया है क्योंकि सभी लड़कियों को टीका लगाने में केंद्रीय स्वास्थ्य बजट से ढाई गुना ज्यादा राशि लग जाएगी। ऊपर से टीका-जनित बीमारी पर खर्च अलग होगा। गोरी हो या काली, सवर्ण हो या आदिवासी, अमीर हो या गरीब, हर लड़की को घेरे में लेकर बराबरी से खतरे में डाला जा रहा है। वह भी एक ऐसे कैंसर के डर से, जिससे बचाव के लिए पुख्ता व निरापद तरीके पहले से ही मौजूद हैं।