Monday, February 18, 2008

स्त्री...ओ ..स्त्री !!

स्त्री,
ओ स्त्री......
तू बोलती क्यों नहीं
तू हंसती क्यों नहीं
तू रोती क्यों नहीं
तू गाती क्यों नहीं
तू चुप क्यों रहती है
तू चीखती क्यों नहीं
तू चिल्लाती क्यों नहीं
तू डांटती-डपती क्यों नहीं
तू झटकती-झकझोरती क्यों नहीं
मारती-गरियाती क्यों नहीं
स्त्री तू चुप क्यों है
स्त्री.....स्त्री
तू कुछ कहती क्यों नहीं
तू जो कहती है
उसे कोई सुनता क्यों नहीं
तू जब रोती है
कोई तुझे चुप क्यों नहीं कराता
तू जब हंसती है
आधी दुनिया हंसती क्यों नहीं
तू झटकती-झकझोरती है
तू जब डांटती-डपती है
मारती-गरियाती है
चीखती-चिल्लाती है
तो क्या होता है???????????????????????.......................

सीमोन द बोउवार कहती हैं-
स्त्री कहीं झुंड बनाकर नहीं रहती। वह पूरी मानवता का आधा हिस्सा होते हुए भी पूरी एक जाति नहीं। गुलाम अपनी गुलामी से परिचित है और एक काला आदमी अपने रंग से, पर स्त्री घरों, अलग-अलग वर्गों एवं भिन्न-भिन्न जातियों में बिखरी हुई है। उसमें क्रांति की चेतना नहीं, क्योंकि अपनी स्थिति के लिए वह स्वयं जिम्मेदार है। वह पुरुष की सह अपराधिनी है। समाजवाद भी पुरुष की सर्वोपरिता की विजय बन जाएगा।
सीमोन का जन्म में फ्रांस में 9 जनवरी 1908 को एक मध्यमवर्गीय कैथोलिक परिवार में हुआ था। उन्होंने बचपन से ही स्त्री होने की पीड़ा को निकट से महसूस किया था। वह कहा करती थीं कि घर और अच्छी पत्नी से जुड़ी हर चीज मुझे मृत्यु-सी डरावनी लगती है। बड़े होने पर विद्रोही बेटी की तरह उनके संबंध पिता से खराब हो गए। 1926 में उन्होंने दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया। बीस साल की उम्र में उनकी सार्त्र से मुलाकात हुई। उनसे उनके गहरे संबंध हो गए। दोनों ने साथ-साथ अध्ययन भी किया, परीक्षाएं दीं, पास हुए। तीन साल बाद वह दर्शनशास्त्र की अध्यापिका बनीं। वह अपनी छात्राओं में बहुत लोकप्रिय थीं। 1943 में उनका पहला उपन्यास शी केम टू स्टे सुर्खियों में आया। फिर सार्त्र के साथ उन्होने एक पत्रिका निकाली। 1945 तक दो उपन्यास और आ गए। वह लगातार लिखती रहीं, एक साथ कई मोरचों पर जूझती रहीं।14 अप्रैल 1986 को उनकी मृत्यु हो गई।
......अर्थात सीमोन को जानना, पढ़ना, एक मोकम्मल स्त्री होने की शुरुआत करना है। एक मोकम्मल स्त्री होने का मतलब है आधी दुनिया का मोकम्मल होना। और आधी दुनिया मोकम्मल हो जाने के बाद......!!

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