
मैं औरत हूं
इसलिए हूं,
इससे क्या फर्क पड़ता है तुम्हे
कि हम हैं या नहीं भी हैं।
हम औरतें उठाती हैं सवाल
तुम करते हो ज्यादतियां और बहसें एक साथ
और हम होती हैं हैरान
या हलाल बार-बार
इससे क्या फर्क पड़ता है तुम्हें
कि हम हैं या नहीं भी हैं।
तुम रचते हो नर्क
हमारे लिए, अपने स्वर्ग के लिए,
करते हो तर्पण हमारी अस्मिता और अस्तित्व के,
बेंचते हो ऐश्वर्य और अनुभूतियां,
खरीदते रहते हो हमें
इससे क्या फर्क पड़ता है तुम्हे।
तुमने बना रखे हैं हमारे लिए
तहखानों के भीतर कई-कई तहखाने,
बुन रखी हैं कई-कई परतें,
जला रखे हैं ऊंची-ऊंची लपटों वाले अलाव,
जिसमें स्वाहा होता रहता है
हमारा सर्वस्व
इससे क्या फर्क पड़ता है तुम्हे।
...लेकिन नहीं,
अब और नहीं, इससे ज्यादा नहीं,
क्योंकि मालूम हो गई हैं हमें
तुम्हारी मर्दानगियों की हिकमतें,
पढ़ ली हैं हमनें
तुम्हारी इतनी सारी किस्से-कहानियों,
अब और कुछ
जानने-सुनने के लिए
बचा भी क्या है,
बची रह गई हैं हम और हमारी कोशिशें,
रंग लाएंगी
कभी-न-कभी, आज नहीं, तो कल
जरूर रंग लाएंगी
हमारी कोशिशों, तुम्हारी कोशिशों के समानांतर
या तुम्हारी कोशिशों के खिलाफ
गूंजेंगी हम समवेत,
जोर-जोर-से।